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कभी डिप्रेशन से जूझ रही थी दीपिका, लेकिन उसे हराया और आज हर एक को इससे लड़ने की प्रेरणा दे रही हैं

डिप्रेशन जितनी कॉमन बीमारी है, उतनी ही कम बात इस पर की जाती है. दीपिका पादुकोण एक सफ़ल अभिनेत्री हैं और जब उन्होंने ख़ुद डिप्रेशन से जूझने और इससे लड़ने के बारे में ख़ुलासा किया, तो सभी हैरत में पड़ गए कि सफ़लता की सीढ़ियां चढ़ती एक अभिनेत्री, डिप्रेस्ड कैसे हो सकती है.

दीपिका पादुकोण जैसी विश्व विख्यात अभिनेत्री ने इस मामले पर खुल कर बात की और बताया कि किस तरह वे एक आम ज़िन्दगी जी रही थी,फ़िल्में कर रही थी, इंटरव्यू दे रही थी, ऑटोग्राफ़्स साइन कर रही थी. सबको उनका चमकदार चेहरा दिख रहा था, पर उस चेहरे के पीछे छिपा दर्द किसी को नहीं दिखा.

Source: HT

दीपिका ने बताया कि उन्हें अलग महसूस होता था. सांस लेने में भी दिक्कत होती थी और उन्हें बिस्तर से उठने का भी मन नहीं करता था. बेवक़्त रोना उनके लिए बहुत आम हो गया था.

दीपिका क़िस्मतवाली हैं, क्योंकि उनकी मां समझ गईं थी कि उनके साथ कुछ सही नहीं है. मां के सपोर्ट और Anna Chandy और Shyam Bhat की Expertise ने उन्हें अवसाद से बाहर निकाला. दीपिका ने Medication, Therapy, दोस्तों, माता-पिता के प्यार से अवसाद पर विजय हासिल की.

Source: Deccan Chronicle

अवसाद से उबरने के बाद दीपिका ने The Live Love Life Foundation नामक Charitable Trust की स्थापना की, ताकि देश में Mental Health से जुड़ी समस्याओं से जूझ रहे लोगों को मदद मिल सके. इसी ट्रस्ट के तहत उन्होंने You Are Not Alone नामक Flagship Awareness Programme भी शुरू किया. इस प्रोग्राम का मकसद है बच्चों और शिक्षकों में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर Awareness पैदा करना.

सोचिए आप किसी घुप्प अंधेरे कमरे में हैं, वहां इतना अंधेरा है कि आपको ख़ुद अपना शरीर ही महसूस नहीं हो रहा है. ऐसी अवस्था में आपको अपने अस्तित्व पर ही शक़ होने लगेगा. आप सोच में पड़ जाएंगे कि आप हैं भी या नहीं. अवसाद ग्रसित या डिप्रेस्ड व्यक्ति की ज़िन्दगी भी कुछ इसी तरह की होती है.

Source: Huffington Post

डिप्रेशन, एक ऐसी बीमारी है, जिसके बारे में इस बीमारी से ग्रसित व्यक्ति को भी पता नहीं चलता. अवसाद-ग्रसित व्यक्ति इसी उधेड़-बुन में ज़िन्दगी बिता देता है कि वो जो भी महसूस कर रहा है वो सब बस एक दौर है और वो जल्द ही बीत जाएगा. अपने एहसासों और Emotions से वो लड़ता-झगड़ता रह जाता है. कुछ लोग दिलो-दिमाग़ की ये लड़ाई हार जाते हैं और आत्महत्या कर लेते हैं, वहीं कुछ लोग उसी तरह ज़िन्दगी गुज़ार देते हैं.

भारत में युवाओं की संख्या दुनिया के दूसरे देशों से काफ़ी ज़्यादा है. अगर भारत के 364 मिलियन युवाओं (10-29 वर्षीय) को अलग किया जाए तो ये अपनेआप में ही किसी देश के समान होगा.

Source: Huffington Post

दुनिया के अन्य युवाओं के तरह ही हमारे देश के युवा भी कई तरह की परेशानियों से जूझते हैं. बचपन से व्यस्क होने तक का सफ़र आसान नहीं और इस उम्र के दौरान युवा अलग-अलग परेशानियों का सामना चुपचाप करते हैं. अंदर ही अंदर अपनी Insecurities, Feelings, Hormonal Imbalance, Ambitions से लड़ते रहते हैं. जब उनके अंदर ऐसी उधेड़-बुन चल रही होती है तो बाहर की दुनिया के लोगों से भी अलग तरह की जंग जारी रहती है. कभी करियर को लेकर तो कभी रिश्तों को लेकर.

2016 में Asian Journal of Psychiatry में प्रकाशित एक शोध के मुताबिक यूनिवर्सिटी के छात्र सबसे ज़्यादा अवसाद ग्रसित होते हैं. Emotional Pain के साथ ही ऐसे छात्रों में स्वयं को नुकसान पहुंचाने की संभावना भी अधिक होते हैं. अवसाद ग्रसित व्यक्ति ख़ुद अपना ही दुश्मन बन जाता है. वो अपने दर्द को कम करने के लिए ड्रग्स, Unsafe Sex, शराब की तरफ़ रुख़ करता है. Extreme केसेस में व्यक्ति ख़ुद को अलग-अलग तरीके से नुकसान पहुंचाता है. इसमें भूखे रहना, नींद ना लेना, ख़ुद को चोट पहुंचाना शामिल हैं. जब हर बात की अति हो जाए तब व्यक्ति अपनी ही जान ले लेता है.

Source: NDTV

भारत में आत्महत्या करने वालों की संख्या बहुत अधिक है. 2015 में ही 14-29 वर्ष के आयुवर्ग में लगभग 51,792 युवाओं ने अपनी जान ले ली. डिप्रेशन किसी टाइम बम की तरह है और ये दुखद है कि हम सब इसके बारे में ज़्यादा नहीं जानते.

अवसाद से ग्रसित व्यक्ति को Anxiety Issues हो जाते हैं. Emotional Breakdown तो काफ़ी आम बात हो जाती है. भूख-नींद, क्या अच्छा है और क्या बुरा, ये सोचने समझने की शक्ति भी नहीं रहती. अगर किसी को ये पता भी चले कि उसके साथ कुछ ठीक नहीं है, तो शर्म और झिझक के कारण वो डॉक्टर के पास नहीं जाता. समाज में किसी भी तरह के मानसिक रोग को पागलपन से जोड़ दिया जाता है, ये भी एक वजह है कि डिप्रेशन जैसी साध्य बीमारी भी असाध्य हो जाती है.

Source: Colors Rainbow

पढ़ने में ये काफ़ी अजीब है, पर जो ये Feel करता है उसके एहसासों को समझ पाना बहुत मुश्किल है. अवसाद ग्रसित व्यक्ति अपनी भावनाएं खुलकर नहीं कह पाता, कई बार तो उसे ख़ुद ये समझ नहीं आता कि जो वो महसूस कर रहा है वो आख़िर क्यों महसूस कर रहा है.

दीपिका पादुकोण की तरह ही कोई भी अन्य अवसाद ग्रसित व्यक्ति इससे जीत सकता है. समय पर इलाज हो तो डिप्रेशन को आसानी से हराया जा सकता है. अगर आप Medication नहीं लेना चाहते हैं तो ऐसे कई प्राकृतिक तरीके भी हैं जिनकी सहायता से इस मर्ज़ को जड़ से ख़त्म किया जा सकता है. ज़रूरत है तो सबसे पहले इसे Accept करनी की. 

 

With Inputs from HT

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